पिंड दान
कौन कर सकता है पिंडदान
क्या नियम है...?
वैधानिक चेतावनी- जो जन्मना सनातनी है, पढ़ें, समझें।
जो नये भगवाधारी नक्काल हिन्दू हैं, दफा हो जायें। उपाध्याय, चौबे, त्रिगुनाईत, दीक्षित, पाठक वाली श्रेणी के लोग, जो भाजपा के मेनिफेस्टो से अप्रूवल लेकर शास्त्र बांचते हैं, वे भी दूर रहें। फालतू में, रामभद्राचार्य को कोट करके बेइज्जत कर दूंगा।
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पिंडदान की महत्ता की व्यत्पत्ति गरुण पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण और महाभारत के श्लोकों से होती है।
जो पण्डित हैं, ग्रन्थ पढ़े हैं, वे श्लोक खोज लेंगे। उनके लिए रेफरेन्स दे रहा हूँ।
ज्येष्ठः पुत्रः पितृकर्म कुर्यात् सर्वदा नरः।
अनुपस्थितौ तस्य स्यात् कनिष्ठोऽपि समान् हि॥
(गरुड़ पुराण, प्रेतखण्ड, अध्याय 9, श्लोक 12)
ज्येष्ठ पुत्र के जीवित और उपलब्ध होने पर सामान्यतः वही पिंड दान करता है। ज्येष्ठ पुत्र मृत, अनुपस्थित, असमर्थ, या सहमत हो, तो अन्य पुत्र भी यह कर्म कर सकते हैं।
यह परिवार की सहमति और परंपरा पर निर्भर करता है।
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दूसरा रेफरेन्स - विष्णु पुराण (तृतीय अंश, अध्याय 13):
पुत्रः कुर्यात् पितृकर्मं ज्येष्ठः सर्वदा प्रियः।
असमर्थे च तस्मिन् स्यात् कनिष्ठोऽपि तदाश्रितः॥
याने ज्येष्ठ पुत्र सदा पितृकर्म के लिए प्रिय है। यदि वह "असमर्थ" हो, तो कनिष्ठ पुत्र भी उसका स्थान ले सकता है।
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पिंड दान को दोबारा तब करना शास्त्रसम्मत है, जब पितृदोष निवारण हेतु हो।
वायु पुराण, अध्याय 105, श्लोक 22
पिण्डदानेन संनादति पुनः कर्म कृते सति।
दोषनाशं च तृप्तिश्च पितृणां चिरकालिकम्॥
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राजनीतिक प्रतिबद्धता अपनी जगह है। आप नीतियों, रीतियों, विचारधारा पर लड़िये।
निजी भी आक्षेप कीजिये, गालियां दीजिये, डराइये, धमकाईये - वह भी एक किस्म की राजनीति है।
लेकिन शर्म आती है उन पण्डितो पर जो आपने नेता के अपकृत्य को डिफेंड करने के लिए, धर्मशास्त्रों को भी सिर के बल खड़ा करने को तैयार हैं।
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कम से कम अपने पूर्वजों के प्रेत को कष्ट देने वाली धारा को स्वीकार्यता देने से बचो। धर्म के नाम पर चुनाव लड़ते हो।
धर्म की तो रक्षा करो।
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