अपराध अपराधी
गिल्टी, अनटिल प्रूव्ड इनोसेंट..
कानून का बेसिक फलसफा है-जब तक कोई अपराध साबित न हो जाये, तब तक आप निर्दोष हैं - इनोसेंट, अनटिल प्रूवन इनोसेंट।
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और इसका एक लीगल टूल है-
"बर्डन ऑफ प्रूफ"
इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
आम तौर पर पुलिस, ED-CBI या कोई एजेंसी आप कोई अपराध कायम करे, तो बर्डन ऑफ प्रूफ, एजेंसी का है।
याने अपराध, स्वतः अप्रमाणित है, जब तक कि अंतिम रूप से, अंतिम अदालत (सुप्रीम कोर्ट) अपना फैसले में आपका अपराध प्रमाणित न मान ले। और इस प्रक्रिया में लगने वाले समय तक आप न अपराधी हैं, न सजा के पात्र।
यह प्राकृतिक न्याय के अनुरूप है।
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इसके कुछ अपवाद भी होते हैं।
यहाँ अगर वनोपज ढोते पकड़े गए, तो प्रूव आपको करना है कि यह वनोपज वैध स्रोत से है। अन्यथा आपका अपराध, पकड़े जाने के वक्त से ही स्वतः प्रमाणित है।
याने यहाँ बर्डन ऑफ प्रूफ, आरोपी पर है। यू आर गिल्टी, अनटिल प्रूव्ड इनोसेंट.. पर जैसा बताया है, ये अपवाद, और बेहद रेयर कानूनों में होता है। क्योकि प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
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अबनअपराध सिद्ध हुआ, कि नही हुआ.. ये एक फैसला है। इसके बाद सजा क्या, कितनी दी जाये, यह दूसरा फैसला है।
जैसे- उस अपराध में मैक्सिमम दस वर्ष की सजा है, जज कितनी दे, 2-5-7 या पूरा दस, अलग विषय है। कोर्ट में इस पर अलग से बहस होती है।
तो पहले अपराध कायम करना-->दोष सिद्धि करना--> सजा देना, ये तीन स्टेप हैं। प्राकृतिक न्याय यही है।
क्या आप अपराध कायम करके, तुरन्त सजा दे सकते है??
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इसका उत्तर स्पस्ट "नही" है। लेकिन मौजूदा सरकार बार बार ऐसे प्रावधान बना रही है। जहां अपराध कायमी के बाद सीधे सजा सुनिश्चित हो जाये।
IPC हटाकर लाये गए BNS में कई ऐसे नुक्ते हैं। मसलन 90 से 180 माह तक बिना जमानत, बिना चार्जशीट जेल में रखा जा सकता है।
समझिये की अभी मुकदमा शुरू ही नही हुआ। चार्जेस फ्रेम नही हुए। आपने 6 माह सजा काट ली।
दूसरी बानगी- मान लीजिए, आप पर कोई फाइनांशियल क्राइम का इल्जाम लगा। BNS कहता है, की यदि कथित अपराध के आगम (कमाई) से, आपने कोई सम्पत्ति बनाई, तो उसे जप्त करके उसकी कुर्की का मुकदमा अलग चलेगा।
याने आप बिना दोष सिद्धि जेल में हैं। आपका घर-दुकान सरकार ने सील कर लिया। घरवाले सड़क पर।
यह एक अपराध में दूसरा मुकदमा है। कल को अपराध से दोषमुक्त हो गए, तो प्रोपर्टी छुड़ाने का दूसरा मुकदमा भी वर्षों तक लड़िये। क्या यह अनकिये अपराध की दोहरी सजा नही है?
यही तानाशाही है।
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सरकार, जिसके पास बहुमत है, कोई भी क़ानून बना सकती है। वह चाहे तो पर्यावरण बचाने के नाम पर, सांस से कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ना अपराध घोषित कर दे।
पुलिस भेजकर आपके मुंह पर पीपा लगवाए। अनुमत मात्रा से ज्यादा गैस छोड़ने पर ट्रायल, जेल-जुर्माना-जप्ती, फिक्स कर दे।
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पर कानून ऐसे नही बनाये जाते। कैसे बनाये जाएं, यही सोचना लॉ मेकर्स याने सांसदों का जॉब है।
पर जब आप बेमतलब के मुद्दों पर, चुनाव जिताकर गूंगे बहरे संसद में भेजते हैं, तो उनके तानाशाह बॉस, उनसे ऐसे ही कानून बनाकर आप पर थोपते हैं।
एक नया कानून बन रहा है- जिसमे CM-PM अगर जेल गए, तो 31 वे दिन उनका पद खत्म। पिछले 3 साल का अनुभव याद करिये और फिर इसका अर्थ समझिये।
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ED के मामलों में जमानत नही मिलती। ट्रायल प्रोसेस में ही नेता बरसो जेल काट रहे हैं। 30 दिन की अवधि है, आम, साधारण केस में भी 1 महीने से कम की पेशी कोर्ट भी नही देती।
सरकारे गिराने का नया मार्ग है। क्या सुनवाई, क्या अपील, कौन सा न्याय. सड़क पर खड़े हवलदार को आपके वोट से बनी सरकार को निपटाने के पॉवर होगा। वह लोकतन्त्र का हैंगमैन होगा।
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यह कहने में कोई लाभ नही RSS-BJP-NDA के लोग भविष्य में अपने गले के साइज का फंदा तैयार कर रहे हैं।
फिलहाल तो उन्हें गुमान है कि यह सब 50 साल बदस्तूर चलेगा। वे गैर भाजपाई ताकतों को पैर रखने की इंच भर जगह भी खत्म कर रहे हैं।
जब जान बचाने के सारे रास्ते खत्म हो जाये, तो अधिकतर लोग समर्पण करते हैं। पर मुट्ठी भर, मौत का डर खत्म करके लड़ते हैं। पूरा समाज उन्ही के गिर्द इकट्ठा हो जाता है।
यही इतिहास की सीख है।
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ईश्वर का शुक्र है, की इन्हें 400 सीट नही आई। अब लँगड़ी सरकार की बैसाखियों पर निगाह होगी। अगला नम्बर उन्ही का होना है।
लेकिन फिर भी वे साथ देते हैं, तो वे लोकतन्त्र के निशानों पर अंतिम पोंछा लगाने के अपराधी होंगे।
गिल्टी, विद प्रूवन क्राइम।
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