इतिहास और भूगोल

कश्मीर में एक जगह है-तुरतुक

लेह से कोई 200 किलोमीटर, नुब्रा वैली से होकर यहाँ जाते है। श्योक नदी के किनारे किनारे चलते हुए, तुरतुक की खासियत यह कि ये बाल्टिस्तान का हिस्सा है।
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गिलगित बाल्टिस्तान।

जहां की पब्लिक 1947 में कश्मीर राजा से विद्रोह करके, अपनी मर्जी से पाकिस्तान से जा मिली थी। (जिन्हें डिटेल में रुचि है, वे Gilgit Rebellion गूगल कर लेवें)

तब वहां के बेहद अलोकप्रिय राजा हरीसिंह, उसे अपने अंगूठे तले, एक स्वतन्त्र स्टेट रखना चाहते थे, और पब्लिक किसी फ़्यूडल किंग की प्रजा नही बनना चाहती थी।

कहने का मतलब, बिना लड़े, (या बिना नेहरू द्वारा दान दिये) ये इलाका जो POK का 90% हिस्सा है, पाकिस्तान की झोली में पके आम की तरह गिर गया था।
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नेहरू की बेटी ने गिलगित बाल्टिस्तान का यह गाँव पाकिस्तान से छीन लिया था। 

जी हां, 1971 में जिसे आप समझते है कि लड़ाई सिर्फ ढाका की ओर हुई थी। वो कश्मीर में भी हुई, और वहां जीती जमीन हमने कभी नही छोड़ी।

तुरतुक सियाचिन का द्वार है। ऊपर पाकिस्तानी पोस्ट की निगाह में, बसा गाँव, जहां से LOC मात्र ढाई किलोमीटर दूर है। इस गाँव मे यहां बाल्टी एथनिसिटी के लोग रहते हैं। भारत के पास केवल 5 ही ऐसे गाँव है।

इस इलाके को जीतने वाले दो अफसरों को महावीर चक्र मिला था।
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पाकिस्तान से जीते गए इलाको में 1965 के दौरान सर क्रीक का इलाका भी है, जो कच्छ के रन में है।

सियाचिन भी लड़ के लिया, जो कश्मीर में है।

आप मानने को तैयार न होंगे, मगर प्रथम परमवीर चक्र विजेता, मेजर सोमनाथ शर्मा की शहादत चीख चीख कर कहती है कि भारत वालो!!!!

ये श्रीनगर से लेकर पुंछ तक, जो भी कश्मीर तुम्हारे हाथ मे है, यह तश्तरी में रखकर नही मिला।

हमने लड़ के लाया है पाकिस्तान से।
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गोआ की जमीन भी हमने जीती है। चीन से 1988 के चीन से सीमा समझौते के ठीक पहले काफी भूभाग, अरुणाचल प्रदेश में कब्जा किया गया गया।

अरुणाचल में तवांग का इलाका हमने कैप्टन बॉब खण्टिंग ( गूगल करो, जल्दी..) के माध्यम से हस्तगत लिया।

लेह से आगे अक्सई चिन तक, जो चीन से LAC है, वह भी हमने "फारवर्ड पॉलिसी" (अरे, गूगल करो भाई) के तहत फौज बढाकर ही ली है।

अरे, लड़कर तो हमने हैदराबाद और जूनागढ़ भी लिया है।
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यह सारी जमीने हमने संघी राज में नही जीती। वो ऊपर से पंचशील, और शांति का कबूतर दिखती थी, लेकिन भीतर से शेरदिल सरकारें थी।

दरअसल तथ्य तो यह है कि मौजूदा बतोलेवीरो के राज में हमने एक इंच जमीन नही जीती, खोई जरूर है।

लेकिन दावा यह कि न कोई घुसा है
न कोई आया है।
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तुरतुक से सियाचिन से तवांग गोआ तक, हमारी सरकारों ने जो किया, चुपचाप किया। ढोल नही पीटे। इसलिए कि एक पुरानी कहावत है-

गरजने वाले बरसते नहीं।

इतिहास हमने तो कभी नही सुना कि टीवी रेडियो पर सरकारी घोषणा हो- कि हमने सेना के हाथ खोल दिये, पैर खोल दिये।

यह अनुचित है, क्योकि ऐसी घोषणा, जितना अपने देश के लोगो मे युद्धोन्माद फैलाती है, उससे ज्यादा दुश्मन को सजग करती हैं।

और दुश्मन को आगाह करना, उसे इंटेलिजेंस इनपुट देने, और अपनी सेना का काम मुश्किल करने के बराबर है।

तभी तो, बरसने वाले, कभी गरजते नही।
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मगर यह दौर विद्रूप का है।

उल्टा ही सीधा है, और सीधे का नाम, उल्टा रख दिया गया है। प्रोपगेंडे के दौर में मात को भी शह का नाम दिया जा सकता है। गुप्तमगुप्त स्ट्राइक पर, खुलेआम विजय जुलूस निकाले जा सकते हैं।

पर असली विजय का जुलूस तो दिलो के भीतर, तब फूट कर निकलता है, जब 55 साल बाद भी आम हिंदुस्तानी सिविलियन्स तुरतुक जाते हैं,

और पाकिस्तान से छीनी जमीन खड़े होकर फोटो खिंचवाते हैं।
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और तब, तो भले वो उस दौर के नेता को याद करे, या न करे। क्या फर्क पड़ता है।

उसकी विजयी मुस्कान में भारत की विजय गाथा लिखी होती है।

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