राजनीति की राजनैतिक विश्लेषण

बांसुरी स्वराज, पोलिटिकल निपोटिज्म का चेहरा हैं।

आम मोदी युग के, खराब जुबान वाले,अहंकारी नेता पुत्रो की कतार मे ताजा चेहरा, जिसमें अनुराग ठाकुर, पीयूष गोयल पहले ही वगैरह ऊंचे दर्जे के सितारे हैं। 
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बांसुरी की पहचान, सुभाषी मितभाषी, सुषमा स्वराज की पुत्री  के रूप में है। 

हालांकि सुषमा स्वराज की अपनी पहचान, ट्विटर वाली विदेशमंत्री, दिल्ली की दो माह कीबाबा बागेश्वर बनाएंगे हिन्दू गाँव..

ये सुंदर केस स्टडी है। पर पहले, हिन्दू राष्ट्र / मुस्लिम राष्ट्र को संक्षिप्त में समझिए।
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हिन्दू और मुस्लिम, पूजन पद्धति है, पंथ, कल्ट, संस्कृति, जीवन शैली है।ये आपकी पत्नी या पति, मां, बाप, साबुन, तेल, टूथपेस्ट की तरह पूर्णतया निजी वस्तु है।

राष्ट्र एक राजनीतिक व्यवस्था है।

यह यह सार्वजनिक व्यवस्था है। एक विशिष्ट भूभाग के सभी व्यक्ति, सारे समाज, बिना कॉन्फ्लिक्ट, न्यूनतम सहमतियों के आधार पर एक साथ, कुछ नियम कायदों के तहत रहें।
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आप लाइफबॉय से नहाए, पड़ोसी लक्स से। यह पसन्द जन्म से आपके पल्ले पड़ी, या आपने चॉइस भी किया हो सकता है- (भले ही राइस बैग लेकर)

लेकिन निजी जीवन में, चार दीवारों के भीतर। वहां रहो कट्टर रामभक्त या कट्टर सुन्नतवादी। बाथरूम में लक्स से नहाओ, या रिन से..

सरकार द्वारा निर्धारित, कोई राष्ट्रीय साबुन नही होना चाहिए।देश की राजव्यवस्था, साबुन निरपेक्ष होनी चाहिए।

धर्मनिरपेक्ष भी होनी चाहिए।
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साबुन का मामला आसान है। क्योकि साबुन के साथ कोई किताब नही जुड़ी। धर्म के साथ जुड़ी होती है।

संविधान एक सेट ऑफ रूल्स है।
धार्मिक किताब भी सेट ऑफ रूल्स देती है।

दोनों सेट ऑफ रूल्स अलग हो सकते है।
तब किसकी बातें मानी जायें?
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मुसलमानी किताब, जिना करने पर पत्थर मारने का नियम देती है। सविधान प्रदत्त कानून इसी मामले में जेल, जुर्माने की व्यवस्था देती है।

हिन्दू किताब, जाति और ऊंच नीच की व्यवस्था देती है। सम्विधान मना करता है, सबकी बराबरी की तजवीज करता है।

याने हमारी धार्मिंक किताब औऱ राजकीय किताब में अलग अलग व्यवस्था है।
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सम्विधान लिखित है। आधुनिक है, संशोधन करके अपडेट बनाये रखने का रास्ता है। उसमे जो कुछ लिखा है, उसका इंटरप्रिटेशन करने को एक सुप्रीम कोर्ट है।

जो दलीलो के आधार पर, उचित और सकारण इंटरप्रिटेशन देता है। दलील देने, सुनने वाले, समाज के मूर्धन्य लोग है। शिक्षित और राजव्यवस्था से परिचित लोग हैं।

धार्मिक किताबे पुरानी है। किसी और ही दौर के सेट ऑफ रूल्स है। उनमे बदलाव की व्यवस्था नही, अपडेट कर नही सकते

किसी और भाषा में लिखी है। जो लिखा है, उसका इंटरप्रिटेशन कोई भी मुल्ला, बाबा, या पादरी करेगा।
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पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र है। वहाँ सम्विधान तो है, पर धार्मिक किताब उसके ऊपर है। भारत,अब तक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ सम्विधान हर किताब के ऊपर है।

यही धर्मनिरपेक्ष व धार्मिक देश में फर्क है।

तो पाकिस्तान में संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून, गैर इस्लामी बताकर मुल्ले खारिज कर सकते हैं। भारत मे बागेश्वर बाबा, आशाराम, और जग्गी वासुदेव और डबल श्री के पास वह पावर नही है।
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वह पावर धीरे धीरे सौंपी जा रही है।

नई संसद में सेंगोल लेकर चलते, सम्राट मोदी और उनके पीछे चलते साधुओ की फौज को याद कीजिए।जैसे उनकी सत्ता ईश्वर और उनके उपासक साधुओ ने दी, धर्म ने दी, भाग्य ने दी, ईवीएम के जिन्न ने दी।

जनता ने नही।

तमाम धर्म संसदें हो रही है। सम्राट टीका लगाकर, झोगला पहनकर मन्दिर मन्दिर घूम रहा है।

अभी अघोषित रूप से "सरकारी राम नवमी" मनाई जाने वाली है। फरसा लेकर आप नाचेंगे।
न नाचा, तो अधर्मी, गैर हिन्दू, गद्दार कहलाएंगे। यह सामाजिक दबाव आप पर डाला जा रहा है।
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आप राजव्यवस्था को, जितना ज्यादा धर्म के पहलू में घुसने की इजाजत देंगे, आपकी ताकत घटेगी, सम्राट की बढ़ेगी।

आप नागरिक नही, श्रद्धालु होते जाएंगे। संसद, कानून, सम्विधान, लोकतंत्र बेमानी हो जाएंगे। सम्राट और उनके राजगुरु का निरंकुश शासन होगा।

धर्म के नाम पर होगा।

धरने प्रदर्शन नही, आप इल्तजा करेंगे। राम राज्य आ गया है, तो "जाहि विधि राखे राम, ताहि बिधि रहना" अपना भाग्य समझेंगे।
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लगभग उस नौबत में आ चुके हैं।

बुलडोजर पर चढ़कर आये राम, न्याय बिखरा कर जा रहे हैं। और चीफ जस्टिस.. सम्राट के संग पूजा पाठ कर रहे हैं।

यही वो ऐतिहासिक ग्लोरी थी, जो प्राचीन गर्व और विश्वगुरु बताकर आपके गले उतार दिया गया।
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अब इस अनौपचारिक हिन्दू राष्ट्र को औपचारिक बनाएंगे। एक गाँव से शुरुआत होगी।

बाबा बागेश्वर इसके अधिष्ठाता होंगे।

फिर तहसील बनेगी, फिर जिला, राज्य और देश। इसके ऊपर बाबा होगा। बाबा समर्थित राजा होगा।

कानून, नियम सम्विधान ये एप्रूव करेंगे। इन्त्रप्रिटेट करेंगे। न पसन्द आये, तो खारिज कर देंगे।
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फिर होगा एक राष्ट्र, एक धर्म, एक राजा, एक साबुन, एक दन्तमंजन, एक रोटी

और एक जूता,

जो विरोध करने वाले के खोपड़े पर पड़ेगा।इन सबकी सुनहरी शुरुआत का उद्घोष हो चुका है। अब देश का पहला हिन्दू गाँव बसाने की शुरुआत हो चुकी है।

अनपढ़, सर्कस-बाज बाबे हिन्दू राष्ट्र की नींव रखेंगे।

बधाई!! सीएम औऱ सोनिया के पीएम बनने पर सिर मुड़ाकर सूखे चने खाने की घोषणा करने वाली ग्रेसफुल नारीवादी महिला के रूप में है। 

वो तो भला हो सोनिया गांधी का, जो मनमोहन को ले आईं। वरना मुझे नही पता कि सुषमा जी मुड़े सिर और कुपोषित अवतार मे  कैसी दिखती। 
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बहरहाल, लेकिन सुषमा स्वराज की एक और पहचान है। यह बताने का आज उचित मुहूर्त है। 

6 अप्रेल.. 

इसके 2 दिन पहले मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार के टूटने की शुरुआत हो गई थी। मसला दोहरी सदस्यता का था। 
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याने इंदिरा का मुकाबला करने के लिए दर्जन भर छोटे मोटे दल मिलाकर जेपी ने एक जनता पार्टी पार्टी बनाई थी।

क्योकि इमरजेंसी पूर्व का हिंसक आंदोलन, तथा  सिंहासन खाली करो, जनता आती है का नारा, #चूकादे की जनता जनार्दन को गद्दी पर बिठाने के लिए नही.. 

जेपी की जेबी जनता पार्टी को गद्दी पर बिठाने के लिए था। 

लेकिन इस दल में जो जनसंघी थे, वे आरएसएस के भी मेंबर थे। यह जेपी से किये गए एक पुराने वादे से धोखा था। 
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जब जेपी ने जनसंघियों को जनता पार्टी में शामिल किया, तो उनसे आएएसएस से अपने सम्बंध तोड़ लेने की समझाइश दी, वादा लिया। 

लेकिन बन्दर गुलाटी खाना छोड़ सकता है, संघी आरएसएस कैसे छोड़े। ये लोग टालते रहे। 

अंततः यह मुद्दा, पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर ने गम्भीरता से लिया। जनता पार्टी के तमाम लीडर, संघियो को आरएसएस की सदस्यता छोड़ने को बाध्य करने लगे। 

और आया 4 अप्रेल का दिन।
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जनता पार्टी की युवा नेत्री सुषमा स्वराज, जनता पार्टी जंतर मंतर स्थित कार्यालय दोपहर करीब 1 बजे, 3 टाइप्ड पन्ने हाथ में लिए पार्टी की युवा पत्रकारों के सामने आईं। 

कहा-"आज पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर की अध्यक्षता में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई। फैसला लिया गया कि पार्टी के साथ दगाबाजी करने वाले 3 नेताओं..

अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और सुंदर सिंह भंडारी - को तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्काशित किया जाता है" 
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इस तरह जनता पार्टी से अटल आडवाणी और भंडारी निकाल फेंके गये। 

फिर जैसे आम आदमी पार्टी से भगाए गए कुछ लोग, "भारतीय आम आदमी पार्टी" बनाये, उसी तर्ज पे जनता पार्टी से भगाए गए लोगो ने "भारतीय जनता पार्टी " बनाई। 

नई राजनीतिक दुकान बनी।उस दुकान का उदघाटन आज ही के पावन दिन, याने 6 अप्रेल को हुआ था। 

तब हिन्दू मुस्लिम राजनीति का कोई लेवाल नहीं था। हमारे बाप दादे समझदार थे। इस वजह से यह घोर संघी दल "गांधीवादी समाजवाद" (WTF 🥴) के नारे के साथ, अटल की सरपरस्ती में आगे बढ़ा। 
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नया दल बनाना, तो बड़ी ही निंदनीय बात थी।

इसलिए जब 1981 में जनता पार्टी का सारनाथ में अधिवेशन हुआ, तब प्रखर नेत्री सुषमा स्वराज ने ही RSS से संबंध रखने वाले, निष्काशित होकर भा-जनता पार्टी बनाने वालों के लिए निंदा प्रस्ताव रखा था। 

एकदम कड़ी निंदा। 
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मजा देखिए, प्रखर नेत्री, भरपूर निंदा करने के बाद, अक्तूबर 1984 आते-आते खुद भाजपा का हिस्सा बन गईं। करनाल से लोकसभा चुनाव भी लड़ लिया।

कारण ये था कि चंद्रशेखर ने देवीलाल को, लोकदल से तोड़कर जनता पार्टी में लाने की बिसात बिछाई थी।

और देवीलाल जैसे मिट्टी पकड़ नेता के रहते, युवा नेत्री सुषमा स्वराज की हरियाणा में दाल न गलने वाली थी। 
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भाजपा को हैप्पी बड्डे बोला जाए। 

और युवा नेत्री बांसुरी स्वराज, जो एक गुणी माता की गुणी पुत्री हैं, भाजपा में उनका भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल है। 

क्योकि जैसा आप जानते हैं, की पूरे देश मे यही एक दल है, जिसमे कोई वंशवाद नही है।

❤️🙏😎

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