जिब्राल्टरी पत्थर

मेडिटरेनियन सी के ऊपर खड़ा, यूरोप का आखरी छोर, रॉक ऑफ जिब्राल्टर

तो दूसरी तरफ वालो के लिए यूरोप प्रवेश की पहली सीढ़ी भी यही है। 
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तो आठवी सदी में जब इस्लाम मानने वालों ने अपना विस्तार शुरू किया, तो यूरोप में पहली जमीन, जिब्राल्टर की जीती। 

किले बनाये, बंदरगाह बनाया, पैर टिकाकर उत्तर की ओर बढ़े। आगे 700 साल उनका राज बना रहा। 
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पाकिस्तान ने भी कश्मीर जीतने के लिए, पहले कदम को ऑपरेशन जिब्राल्टर का नाम दिया। 

1947 में श्रीनगर उनके हाथ आकर फिसल गया था।लेकिन 1965 आते आते उसका आर्थिक, सामरिक ढांचा मजबूत हो चुका था। 

इधर गोवा जीतने वाली सेना, 62 में चीन से हार  चुकी थी। नेहरू के बाद भारत की अंतराष्ट्रीय पकड़ कमजोर होने के भी संकेत थे। 
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शास्त्री कमजोर नेता हैं, इस थ्योरी का परीक्षण पाकिस्तान ने कच्छ के रन में किया। भारत ने एक बड़ी टेरेटरी खो दी।

तो जोश से लबरेज पाकिस्तान ने कश्मीर लेने का यत्न किया। ऑपरेशन जिब्राल्टर रचा गया। 

याने कश्मीरी बनकर, पाकिस्तानी लोग घुसेंगे। 
आर्म्ड विद्रोह करेंगे, बेस बनाएंगे। फिर (नकली) कश्मीरियो आवाहन पर पाक सेना घुसेगी।

कश्मीर जीत लेंगे।

1965 में पाकिस्तान की योजना यही थी। सादी ड्रेस में 10 हजार से अधिक पाक फौजी/ कबायली घुस आए।मारकाट, खून खराबा शुरू हो गया।
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मोहम्मद जागीर को पहाड़ो में छिपे कबायली दिखे। उन्हें आगे बढ़ने के लिए फिरन (स्थानीय वेशभूषा) चाहिए थी, मार्ग दर्शक चाहिए थे। 

तो मदद का वादा कर, जागीर निकले। और सीधे पहुचे पुलिस के पास। खबर सेना तक गई, जिसने घेर लिया।

घुसपैठिये पकड़े गए। ऑपरेशन जिब्राल्टर का भंडा फूट गया। 
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जब ऑफिशियली पाक सेना घुसी,(ऑपरेशन ग्राण्ड स्लेम) भारतीय फौज तैयार खड़ी थी। 

हाजी पीर उस युद्ध में हमारी बड़ी महत्वपूर्ण जीत थी। दलान गाँव के सरपंच गुलाम दीन ने सुरक्षित रास्ता बताया। यहां की हार ने पाकिस्तानी बढ़त मिटा दी।
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जागीर और गुलाम दीन जैसे बहुतेरे कश्मीरी सेना को खबर करते रहे, आतंकी पकड़वाते रहे। अगर शास्त्री अगर शान से ताशकन्द गए, तो कश्मीरियों की भूमिका बड़ी थी। 

जागीर को पद्मश्री दी गई। इंदिरा ने पूछा- कोई इनाम चाहिए? जागीर ने मांगा एक फिलिप्स का रेडियो। और कहा कि जिस लड़की से प्यार करते है, उसके मां बाप को राजी करवाया जाए। 

रेडियो भी मिला, सरकारी अफसरों ने लड़की के मां बाप को राजी कर ब्याह भी कराया। पद्मश्री मोहम्मद जागीर ने एक खुशनुमा जिंदगी जी।
 
90 के दशक में उन्हें मार दिया गया। दरअसल हर वो शख्स मारा गया, जो भारत की मदद करता था। वे हिन्दू, मुस्लिम- नाम पूछकर नही मारते थे। 

यह ट्रेन्ड तो नया है।
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65 और 90 के बाद झेलम में बहुत पानी बह चुका है। सन 2002 के बाद लगभग शांति का दौर था, जिसमे खलल 2009-10 की पत्थरबाजी से पड़ा। 

तब किसी नाले में दो युवा लड़कियों की लाश मिली थी। इल्जाम सिक्योरिटी फोर्सज पर डाला गया। प्रदर्शन हुए। 

इसके पहले, कश्मीर में सदा से पाकिस्तान समर्थंक लोग थे, पर अधिकतर भारत समर्थंक। 

फिर भारत समर्थंक न बचे। आतंकियों ने टारगेट करके उन्हें मार दिया, या फिर भारत सरकार की नीतियों ने उन्हें कहीं का न रखा।
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नोटबन्दी और 370 हटने से आतंकवाद की कितनी कमर टूटी, ख़ुदा जाने। मगर इस प्रोपगंडा ने ये तो किया था, कि शेष भारत के लोग निर्भय होकर पर्यटन के लिए फिर कश्मीर आने लगे। 

मूर्छित कश्मीरी अर्थव्यवस्था में जान आयी। पर्यटक स्थल गुलजार हुए। घोड़े वाले, बोट वाले, होटल वाले, ढाबे, फोटोग्राफर, मैगी बनाने वाले, स्कीइंग कराने वाले मुस्कुराने लगे। 

अब उनकी चिंता इस्लाम, भारत-पाकिस्तान या आजादी नहीं, बर्फ का न गिरना हो चुकी थी। 

कि पहलगाम ने फिर सबकुछ बदल दिया है। मारे गए पर्यटक तो 2 दर्जन है। मगर ये गोलियाँ घाटी के 1 करोड़ लोगों के पेट पर लगी हैं। 
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इन मौतों का लाभ किसे है, कौन इन लाशो पर अट्टहास कर रहा है, इसके उत्तर मिलेंगे या नही, किसे पता? 

लेकिन हत्यारे जहाँ से भी आये, वे जो भी है.. अभी कश्मीर में ही हैं। आगे भी जो हथियारबन्द लोग आएंगे, कश्मीर के किसी घर, किसी गुफा, किसी जंगल मे शरण लिए होंगे। 

इनकी निशानदेही करनी होगी।
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कश्मीरी सिर्फ कैंडल मार्च और आलोचना करके जिम्मेदारी से मुक्त नही हो सकते। अगर मौजूदा कश्मीरी, अगली पीढ़ी का सुख सुकून चाहता है, तो उसे मकबूल बट या बुरहान वानी नही, 

गुलाम दीन बनना होगा। 
मोहम्मद जागीर बनना होगा। 
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कश्मीर कभी फिर जन्नत बना, तो उस शान्ति, और समृद्धि की भगीरथ, सेना नही होगी। नेता तो कतई नही होंगे।

वह तो कश्मीर की अवाम होगी। 
कश्मीरी युवा होंगे। 

सुलगाने की राजनीति, औऱ इस लहू के समुद्र के सामने सीना ताने, हिंदुस्तान का रॉक ऑफ जिब्राल्टर भी हमारे कश्मीरी ही होंगे।
🙏

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