अपरिमित भ्रमजाल
पहले वे मुसलमानो के लिए आये
मैं ठठाकर हंसा,
उनसे नफरत जो करता था
फिर वे क्रिस्चियन के लिए आये
मैं चुप था, वे भी विदेशी जो थे।
फिर वे सिखों के लिए आये
निगाहे फेर ली मैनें, मैं सिख भी तो न था
फिर वे जैनियो पर टूटे, मैं मुस्कुराया
ये साले भी बहुत इतरा रहे थे
★★
तब जब वे मेरे लिए आये,
गले मे गद्दार, भ्रस्ट, द्रोही
वामपन्थी के तमगे लटकाए,
लेकर चले
सिर झुकाए मैंने महसूस किया
कोई ठठाकर हंस रहा था
कोई मेरी नस्ल, धर्म,
मेरी भाषा को गालियां दे रहा था
किसी ने कहा- बहुत इतराता था ये
★★
कत्लगाह पहुँच
मैनें आखरी निगाह उठाई
अजब ही मंजर था
हंसती हुई भीड़ में
हरेक के गले एक बिल्ला
पीठ और सर पर
लकड़ियों का गट्ठर था
वे यंत्रवत,
अपने नाप की चितायें सजा रहे थे..
😊
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