राष्ट्रीय आत्महत्या या चुनाव जिताऊ अवधारणा?

डोनाल्ड ट्रम्प का पूर्णतया मोदी करण हो चुका है, हार्वर्ड का जेनएयू करण..लेकिन अमेरिका का भारतीयकरण, अभी नही हुआ है। 

अमेरिका में ट्रम्प के फैसलों को लेकर गम्भीर विमर्श जारी है। और जितनी भी बहसें देख रहा हूँ, इसका केंद्रीय विमर्श अर्थव्यवस्था है। 

अमेरिकन्स अपने आर्थिंक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। वे जॉब कट्स, सामाजिक सुरक्षा, हेल्थकेयर पर ट्रम्प प्रशासन के फैसलों पर समीक्षा कर रहे हैं। 
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अर्थशास्त्री बता रहे है कि कैसे ट्रम्प एक कालातीत विचार को जी रहे हैं। वे अमेरिकन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना चाहते है, क्योकि उसमे अमेरिका की GDP का 3-4% हिस्सा ही है।

वस्तुओं के व्यापार में अमेरिका भयंकर ट्रेड घाटे मे है- सच है। लेकिन वह सेवा क्षेत्र जिसमे जीडीपी का 75% हिस्सा है, जिसमे वह दुनिया के साथ अप्रतिम ट्रेड सरप्लस में है, उल्लेख नही करते।

उनकी नीतियां वस्तु निर्माण क्षेत्र में अमेरिका का भला करें या न करें, लेकिनउनका आइसोलेशनिज्म सेवा क्षेत्र में अमेरिकन बादशाहत को जमीन अवश्य सूंघा देगी। 
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बहस ट्रंप के आदेशों की कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी पर भी है। अमेरिका में, किसी भी और डेमोक्रेसी की तरह, कानून/टैक्स का निर्धारण पार्लियामेंट करती है। 

बल्कि ब्रिटेन से उसका आजादी का युद्ध 400 साल पहले इसी बात पर शुरू हुआ था, कि एक व्यक्ति (राजा) टैक्स नही तय करेगा। वह जनप्रतिधियों की सभा तय करेगी। 

सच कहें तो ब्रिटिश मैग्नाकार्टा से लेकर फ्रेंच रेवल्यूशन का आधार यही था। ट्रम्प ने राष्ट्रपति को मिली इमरजेंसी पॉवर्स का उपयोग करके टैरिफ ( जो अपने देश के लोगो पर टैक्स ही है) लगा दिये, जो अमरीकी कांग्रेस के अधिकार का अतिक्रमण है। 

इसके लिए फैंटानील इमरजेंसी लगाई गई है। यह एक नशीली दवा है, जो ट्रम्प के अनुसार, अमेरिका के गली गली गांव गांव में चूरन की तरह बिक रही है। 

उनके तमाम दावों की तरह यह भी झूठ ही है। 
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बात अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में लॉबीइंग और राजनीतिक चंदे पर हो रही है। जहां कारपोरेट चंदे के बूते अरबो डॉलर्स का चुनावी अभियान होता है। और वोटर को भयंकर प्रचार से प्रभावित कर वोट लेने के बाद प्रशासन अपने चन्दा दाताओं के लिए नीति बनाते है। 

यह नग्न करप्शन है। एलोन मस्क ने इसे धनिकों के अधिकार की तरह पेश ही नही किया, बल्कि खुलेआम समान्तर सरकार बन गए है। 

वे कांग्रेस के सांसदों को धमका रहे है कि यदि वे लोग इन नीतियों का विरोध करेंगे, तो उनके चुनाव क्षेत्र में विरोधी को फण्ड करके उनकी राजनीति चौपट कर देंगे। 
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बात आर्थिक असमानता, वर्किंग क्लास और अंडरक्लास की गिरते जीवन स्तर, हेल्थकेयर,  और शिक्षा जैसे मानवीय विषयो पर सरकार के रुख और बजट कट पर हो रही है। 

इमिग्रेंट्स के साथ नीच व्यवहार, मित्र देशो के साथ हेकडीबाजी, और हर विरोधी संस्थान को वित्तीय रूप से तोड़ने, उन पर निजी हमले करने की प्रवृति पर हो रही है। 
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भारत मे बैठे आम इंसान के लिए इस तरह के विमर्श एक सीख है। ऊपर लिखा हर पैरा कमोबेश भारत के सामाजिक राजनीतिक हालात का आईना लगता है।

इन हालात से हम 11 वर्षो से गुजर रहे हैं। मगर हमारा विमर्श मध्ययुगीन मसलों पर हो रहा है। चाहे समर्थन हो या विरोध, चर्चा धार्मिंक वैमनस्य की है। 

जो विरोध में है, वह गद्दार, गैर हिन्दू, नक्सली घोषित किया जा रहा है। 

मात्र 4 माह में अमेरिकी एक चुने गए राष्ट्रपति के विरुद्ध लामबन्द हैं। ऐसा नही की वे बाइडन के समर्थंक थे, या डेमोक्रेटिक पार्टी के वोटर मात्र हैं। वे कन्सर्नड सिटीजन है। वे अमेरिकन है। 
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और हम भारतीय, जो इस नीति को तीन बार चुन चुके है। जो बताती है कि सामूहिक राष्ट्रीय आत्महत्या का विचार, एक चुनाव जिताऊ अवधारणा है। 

और जो विचार चुनाव जिताऊ है, उसे कोई राजनेता या दल, भला क्यो ही बदलेगा? 

अमेरिकी इस दौर से उबर जाते है, तो यह सफलता उनके राष्ट्रीय विमर्श औए जेहन पर रेशनल थॉट्स की होगी। 

भारत जो अब लगभग डूब चुका है, इस असफलता का नजला इतिहास में नेताओ पर नही, इस दौर की जनता का होगा।
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हम जनता, जिसका विमर्श कच्चा, संस्कृति भय और नफरत, और कृत्य दंगेबाजी के थे। 

आखिर जेएनयू को देश विरोधी घोषित करने वाले, उसमे  घुसकर मारपीट करने वाले, पुलिस की वर्दी में घुसाये गए, आम भारतीय ही तो थे।

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