मंजिले अपनी अपनी

मंजिले उनको मिलती है
जिनके सपनो में जान होती है
पंखों से कुछ नही होता
हौसलों से उड़ान होती है..

बचपन मे स्कूली स्पीच देने के लिए रटी हुई लाइनों पर आज मुझे हृदय से भरोसा भी हो गया। 

जब देखा कि जंग लगी तलवारों, और बारात वाली पगड़ी लगाए तुन्दीयल, मोटे, हांफते कांपते लोगो ने, हौसले दिखाकर सर्वशक्तिमान सरकार की वकत, दो कौड़ी की कर दी। 
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मध्यकालीन वेशभूषा, प्राचीन हथियार और नवोन्मेषी नारो के साथ ऐसी उपलब्धि कोई मजाक तो है नही।

इस कृत्य से राजपूती शान में बेकदरी करने वाले सपाई सांसद को औकात बता दी। सूत्रों के अनुसार वे अब सूखे पत्ते की तरह कांप रहे हैं, और बार बार सुसू आ रही है।

भय उस न्यूक्लियर वैपन का है, जिसे नारेबाजी कहते है। इसका ब्रह्मास्त्र है- 

समथिंग समथिंग कड़वा है

इतिहास मे पहली बार इस नारे का इस्तेमाल हुआ। अपेक्षित परिणाम निकले हैं। सांसद जी अभी तक 50 माफीनामा लिखकर फाड़ चुके हैं। 

जैसे ही सावरकर से बेहतर ड्राफ्ट लिख लेंगे, वे करणी सेना को प्रेषित कर देंगे। यह ऐतिहासिक विजय का क्षण होगा। एक सच्चा राजपूत होने के नाते मुझे उस क्षण का इंतजार है। 
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करणी सेना लेट हो गयी। 

दो ढाई हजार साल। सोचिये, 323 BCE में ये लोग मौजूद होते, तो झेलम कब तट पर पोरस के हाथियों के आगे, इनकी पंक्ति होती। 

सारे चीखकर नारे लगाते

नीम का पत्ता कड़वा है

सिकन्दर सिर पांव रखकर जो भागता, की सीधे मेसीडोनिया जाकर रुकता। पर ऐसा हुआ नहीं। क्योकि राजपूती सेना लेट हो गयी। 
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काफी लेट। पहली बार राजपूत आठवी दसवीं शताब्दी में जाकर दिखते हैं। इस बीच भारत मे निम्न जातियों का शासन रहा। जैसे मौर्य (OBC) और गुप्ता (बनिया)  

अलग बात कि वे लोग झूठमूठ खुद को राजपूत क्षत्रिय वगैरह बताते रहे। भारत के सम्विधान में तो इन्हें obc कैटगरी में ही रखा है। बेचारे अभी भी शिक्षक भर्ती में अपना कोटा खोज रहे हैं। 

इस अतिविलंब के कारण, भारत मे ग्रीक, सीथियन, पार्थियन अपने राज बनाकर चले गए। ये लोग होते तो मिलकर भोथरे हथियार लहराते और चिल्लाते

नीम का पत्ता कड़वा है
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लेकिन आखिरकार वे आये। देश बचाया। राजपुताना स्थापित किया। 

फिर गजनवी आया, गौरी आया। इन्होंने भरजोर प्रयास किया। साफे बांधे, तलवार दिखाई। युद्ध भूमि में सबने जोर जोर से नारे लगाए।

नीम का पत्ता कड़वा है


अफसोस। तब स्टेट में फेवरेबल सरकार थी नही। होती तो नतीजे कुछ और होते। थोड़ा लोचा तो हो गया गुरु। 
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कोई नही। मुगल आये। नारे लगे, मुगल डर गए। राजपूतों को अपना संरक्षक मान लिया। अपने बेटे, इनकी बेटियों से विवाह कर इनके हवाले कर दिए।

तब द्रवित हुए सेनानियों में मन प्रण से मुगलो को संरक्षण दिया। हरम की सुरक्षा ड्यूटी की, 400 साल उनका राज बचाया। 

कुछ नासमझ, अनडिप्लोमेटिक राजाओ को छोड़कर, जो अपनी आजादी के लिए लड़े, जान और राज्य खोए। 
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अंग्रेज सब जानते थे। वे हिस्ट्री कॉन्शस थे। उन्होंने इसलिए बंगाल से शुरुआत की। इनके इलाके से एकदम अपोजिट। जानते थे, उधर गये तो सारे इकट्ठे हो जाएंगे। 

नीम का पत्ता कड़वा है

राजपूताना छोड़ना पड़ेगा। फिर तो तख्तेलन्दन तक चलेगी तेग राजपूतान की...
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बाद में उन्होंने ले-देकर सेटल कर लिया। अंग्रेज अपनी जगह, और रजवाड़े अपनी जगह। नो क्लेश, नो नारेबाजी। 

बदमाश तो नेहरू सरकार निकली। राज और ताज हड़प लिए। एक ठो डेमोक्रेटिक हिंदुस्तान बना दिया। डेमोक्रेसी राजपूताने की परंपरा नही है। वहां तलवारों की, बढ़ बोली की परंपरा है। 

सिर उठाया, तो प्रिवीपर्स चला गया। तो सन्निपात में 40 साल बीते। अब ले देकर वापस शान का दौर आया है। 

इस दौर का जश्न मनाने सेना बनी है। पुरानी तलवारे और नए नारे निकाले गए। अकबर की राजधानी में लोग चिलचिलाती गर्मी में सनग्लास लगाए, तलवारें पकड़े- भड़वा भड़वा चिल्लाकर राजपूती शान में चार चांद लगाकर चले गए। 
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इस प्रदेश मे कोई आर्म्स एक्ट नही। आप नंगी तलवारें लहराने को स्वतन्त्र हैं। बशर्ते नारे विपक्ष के किसी सांसद, विधायक या नेता के खिलाफ लगते रहें।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका की यहां कानून व्यवस्था ध्वस्त है। बेनिफिट लिया जा सकता है। और मुगलो से बाबा के राज तक, बेनिफिट कौन सबसे ज्यादा लेता रहा है, सोचिये जरा। 

मैं आज गौरवान्वित हूँ। एकाध तलवार खोज रहा हूँ। कड़वा भड़वा वाले नए नारे कम्पोज कर रहा हूँ। किराया दुकान से 100 साफे भी बुक करा लिए हैं। ठीक ठाक सीवी बनाकर, सेना की फ्रेंचाइज़ का आवेदन करूँगा।  

सभी राजपूत इंतजार करें। हम राजपूतों की खोई शान, हर गाँव, हर शहर में शीघ्र लौटेगी। आगरा से इसकी राह खुल चुकी है।
नीम का पत्ता कड़वा है 
इसके आगे का नारा उनको ही मुबारक हो।


🙏❤️

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