पुनर्वलोकन

द रोड टू हेल
इज पेव्ड विद नोबल इंटेंशन्स..

लोहिया और जेपी पर बात हो रही है। तमाम लोग इस बात पर सहमत हैं, औऱ मैं भी..

कि दोनों ही महान, युगप्रवर्तक, ईमानदार, निष्ठावान, देशभक्त, समाजवादी, क्रांतिकारी, देशभक्त और जीवट वाले शख्स थे। 
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लेकिन गांधी की लाश के नीचे दबकर, मरणासन्न हो चुकी साम्प्रदायिक- फासिस्ट ताकतों को संजीवनी देकर, फिर से रोपने और खाद बीज देने का श्रेय इनसे छीना कैसे जाये?? 

मौजूदा पीढ़ी के लिए सवाल यह नही, कि अपने दौर में वे किस तरह के शख्स थे। सवाल यह कि उनके कार्यो का लांग टर्म इम्पेक्ट क्या हुआ?? 
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यह सच है, कि उनका दौर कांग्रेस हेजमोनी का दौर था। एक विशाल ताकत, जो लोगो के दिलो दिमाग पर तारी थी। 

जिसके पास आजादी के  आंदोलन की पहचान थी, राष्ट्रव्यापी नेटवर्क था, मजबूत नेता थे औऱ सत्ता का साथ था। 

इसके सामने समाजवादी दल, बेहद कमजोर चुनौती थे। उनको मजबूत करना, एक सशक्त चुनौती देना लोकतन्त्र का तकाजा था। 

लोहिया और जेपी ने यही किया। 
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लेकिन भूख लगने पर जहर तो नही खाया जाता। 

इतिहास गवाह है, कि संघ और उसके राजनीतिक मुखौटे को अपने ईमानदार, निष्ठावान, देशभक्त, समाजवादी, क्रांतिकारी, देशभक्त बैनर तले लाकर वह जहर देश के गले उतार दिया। 

और बनाई विपक्षी एकता, 
फिर सरकारे भी बनाई। 

लेकिन क्षणभंगुर.. मुख्यधारा में लौटने के बाद, उन्हें न लोहिया की जरूरत थी, न जेपी की। केंचुआ, उनके स्पर्श से अजगर बन चुका है।
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और पहले उसने समाजवादियों को ही निगला। जो जेपी और लोहिया की विरासत की बात करते थे, उनमे इक्के दुक्के ही बचे हैं, जो क़िला लड़ा रहे है। 

शेष प्रत्यक्ष या परोक्ष, साम्प्रदायिकता की गोद मे खेल रहे हैं। समाजवादी आंदोलन खत्म हो चुका है। लोहिया और जेपी की लेगेसी भी...

जो बचा है, वह देश का गला घोंटने में साथ दे रहा है।
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हमारी पीढ़ी, उनके अवसान के 50 साल बाद, उनके अवदानों के नतीजे भुगत रही है। बेहतर रूप में समझ रही है। 

तो उन्हें उसी काल खंड में सीमित रखकर, उनके गुणवत्तापूर्ण निजी शख्सियत के दायरों में रखकर देखने की जिद क्यो₹₹ 

क्या नेक इरादों से, दूरदर्शिता का अभाव, और भुगते हुए नतीजों से आंखे मीची जा सकती हैं।
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देश जब इतिहास में औरंगजेब से लेकर नेहरू तक हर शख्स का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है, तो जेपी और लोहिया को क्यो बख्शा जाना चाहिए?? 

यह सच है कि उन्होंने एक सुंदर स्वप्न देखा था। उनकी नीयत में कोई खोट नहीं, कोई बुरा इरादा नही। मगर देश उनके हिस्टोरिकल ब्लंडर के बाहुपाश में दम तोड़ रहा है। तो हमारी पीढ़ी को यह कहने की इजाजत दीजिये..

दे हैव पेव्ड रोड टू दिस हेल
विद नोबल इंटेंशन्स..

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